रक्ष असमान
(खंड 8)
किसी भी अंधेरी गली में
किसी भी गुफा द्वार में प्रवेश कर जाता हूं।
भीतर की अंधेरी सीलन
मुझे अच्छी लगती है।
वहां घुटने टेक कर बैठी हुई
अधमरी ज़िदंगी,
आंखें मूंदकर, सिर झुकाए
हाथ वक्ष से चिपकाए प्रार्थना रत जिंदगी
मुझे क्रोधित नहीं करती
क्योंकि मैं जानता हूं
ये मजबूर लोग जो कुछ मांग रहे हैं
बस वही इन्हें नहीं मिलना है
क्योंकि ये सिर्फ मांग रहे हैं
इंसान से या अपने भगवान से।
दूसरों के सशक्त हाथों से
अपनी गर्दनें छुड़वाने के
संघर्ष में लगे अशक्त लोग
मुझे द्रवित नहीं करते – क्योंकि मैं
जानता हूं इस सहज संबंध को
जो केवल एक स्थिति है
जो कभी क्रांति नहीं ला सकती।
एक शव से सटा हुआ दूसरा शव!
देखता हूं इस
संस्था-बद्ध नियम-बद्ध शव स्थिति को
जिसे मैं कोई महत्व नहीं देता
क्योंकि संस्था
सरकंडों के राक्षस के सिवाय कुछ नहीं