उपनिवेशिक मानसिकता बहुत गहरे हमारी सारी पद्घतियों में मौजूद है। प्रशासनिक प्रबन्धन अंग्रेज़ों ने सिर्फ भय और रौब रुतबा बनाए रखने के लिए स्थापित किया था। वही भय और रौब रुतबा हमारी सभी सरकारों ने जानबूझ कर बनाए रखा है, तोड़ा नहीं। आखिर ये लोग भी सिर्फ शासन ही करना चाहते हैं। भ्रष्टाचार साथ जुड़ जाने से रौब रुतबे में सम्पन्नता की चमक भी आई है। अंग्रेज़ दूर से ही अलग पहचाने जाते थे। इन्हें भी दूर से अलग पहचाने जाने लायक कुछ चाहिए था जो लोगों से इन्हें अलग थलग रख सके। इस पद्घति में आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता थी। अफसर सभी देशों में होते हैं। अफसरशाही सिर्फ हमारे यहां है। वे अपनी गोपनीयता और अदृश्यता में दुनिया के सभी ब्यूरोक्रेटस को लज्जित कर सकते हैं। इन प्रशासकों ने सारे देश को अपनी शक्ति से गूंगा बहरा बना रखा है। अपनी जिम्मेवारी के अहसास से मुक्त दूर दराज की चीज बनकर वे अपने अज्ञातवास से शासन-प्रशासन का प्रसारण करते हैं जो अंग्रेज़ों की याद ही ताज़ा करता है।
हमारी दूसरी संस्थाएं उसी मानसिकता को और गहरे में स्थापित करने में लगी हुई हैं। शिक्षा पद्घति एक ऐसे वर्गीय विभाजन की नींव खोद रही है जो आगे चलकर हमारी सारी लोकतांत्रिक मान्यताओं को निरर्थक बना देगी। प्राईमरी शिक्षा से ही यह सामाजिक विभाजन शुरू हो जाता है। स्कूल या तो रजवाड़े हैं या फिर सूअर बाड़े। सभी इस असमानता को अपनी हैसियत से जोड़ कर देख रहे हैं और बच्चों की सोच को शुरू से ही प्रदूषित कर रहे हैं। समान अवसर का तर्क आज किसी को समझ में नहीं आ रहा। कम्पीटीशन का तर्क समान अवसर के बाद ही समझ आता है। बराबर अवसरों के बाद अपनी सामर्थ्य की ऊंच नीच पता चलती है। असमान धरातल पर खड़े होकर समानता की बात एक कुतर्क है जिसे हमारी शासन प्रणाली देखना नहीं चाहती। किसी भी लोकतांत्रिक मूल्य को कोई भी राजनीतिक दल मन से नहीं मानता। आचरण से नहीं मानता।
भारत प्राईमरी शिक्षा पर व्यय करने की दर में दुनिया में सबसे नीचे आता है। प्राईवेट शिक्षा भारत का सबसे बड़ा व्यवसाय बना हुआ है। सामाजिक विभाजन आज जातीय के साथ साथ शैक्षिय भी हो गया है। लोकतांत्रिक समानता की अवधारणा इन दोनों असमानताओं की शिकार है।
हमारी आर्थिक नीतियाँ दुनिया के शहरी देशों की नकल हैं। Market Economy एक शहरी व्यवस्था है। यू.एस.ए. 81 प्रतिशत शहरी है, जापान 95 प्रतिशत, रूस 73 प्रतिशत और मैक्सिको 75 प्रतिशत। यूरोप के सारे देशों की जनसंख्या का 70 प्रतिशत से अधिक शहरी है। इन सब देशों में मुख्य उत्पादन उद्योगों से है। भारत की बात इससे बिल्कुल उल्टी है। 74 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का उत्पादन कुल 17.4 प्रतिशत।4,5 उद्योगों का और सर्विस सेक्टर का उत्पादन शहरों में केंद्रित है जो 71 प्रतिशत है। सारा ध्यान ही शहरों पर है। 1970 के दशक के बाद होने वाली हरित क्राँति की उपलब्धियाँ 1990 के दशक के बाद कम होनी शुरू हो गईं। 1992 के संविधान में संशोधन से ग्राम में तीन स्तरीय स्वशासन पद्घति के बाद भी स्वेच्छाचारियों ने इसे इस मन्तव्य के विरुद्घ ही रखा। विकास धन शहर में केन्द्रित प्रशासन द्वारा निर्देशित होता रहा। आर्थिक उदारीकरण की नीतियाँ भी उसके बाद ही आईं जिनका फायदा खेत-मजदूरों को नहीं पहुँचा।
यह ठीक है कि विकास के लिए विकसित देशों के मॉडल की तरफ ही देखना पड़ता है। लेकिन अपनी ज़रूरतों के सन्दर्भों के अनुसार ही ऐसा होना चाहिए। हमारे देश में ग्रामीण उत्पादन से सम्बन्धित सारे छोटे उद्योग धन्धे गांवों में केन्द्रित किए जा सकते थे। इसी बहाने वहाँ दूसरी सुविधाएं भी पहुँचती। हमारे कुल मजदूरों का केवल 6 प्रतिशत बडे़ उद्योगों में काम करता है। 94 प्रतिशत श्रमिक Unorganized Sector में काम करते हैं। इसी Unorganized Sector का बड़ा भाग गांव छोड़कर शहर में इधर-उधर श्रम करता है। इन्हें ही अपने गांवों में केन्द्रित उत्पादन में लगाया जा सकता था। लघु उद्योग अपने साथ सांस्कृतिक और शैक्षिक वातावरण भी गांव में लाते। आज गांव की पंचायतें इन्हीं दो मानवीय संसाधनों के अभाव में अपनी संवैधानिक शक्ति को या तो पहचानती नहीं या उनको अनदेखा करती हैं, अतिक्रमण भी करती हैं। पूरा राजनीतिक दृष्य आज हमारे गांवों में दूषित हो गया है। दूसरे मानवीय सांस्कृतिक संसाधनों का केन्द्र भी आज सिर्फ शहर ही हैं, गांव सांस्कृतिक मरुभूमियां हैं।
बीस वर्ष पहले खेती बाड़ी का उत्पादन 29.4 प्रतिशत था। यानि हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था दिनों दिन कमज़ोर होती जा रही है। ये सब बातें हमारे लोकतन्त्र की ही कार्यकारी सफलता या असफलता का आंशिक आईना तो बनती ही हैं। शहरों और गांवों के श्रमजीवी अपनी स्थितियों में पहले की अपेक्षा कमज़ोर हुए हैं। मिडिल क्लास की संख्या बढ़ी है जो अच्छी बात है , गांवों में श्रमिक वर्ग बेकार हो रहा है। किसानों की बढ़ती हुई आत्महत्या की संख्या पूरे देश के लिए गम्भीर चिन्ता का विषय होना चाहिए।