कविता

जुलूस

गांधी ने देखा-
 डूबते सूरज की दिशा में भागते लोगों को ।
हंसे ,अपनी उसी हल्के विनोद की मुद्रा में
जिसे पिछली सदी के लोग और आकाशवासी खूब जानते हैं।
 कुछ सोचकर बोले ,एक जुलूस निकालना होगा 
डूबते सूरज के पक्ष में।

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आज़ादी की सुबह (और उस के बाद)

हमारे हाथों पैरों पर 
ज़ेवर की तरह खूबसूरत लगे हमें
जंजीरों के यह निशान 
और नई सुबह की नीम खुमारी में
 एकदम उन्हें छीलकर उतार फेंकने के
ओछेपन से खुद को बचा लिया हमने 
..

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