विमोह

विमोह

अपने ही अहम् के छिद्र से
झांक कर देखता हूँ
उन बौनों के लिए हैं
जो तृप्त हैं
अपने सर पर – कटोरा भर आकाश से।
यह कुर्सियां, मेज़, बिस्तर और
इन पर बैठते, सोते, जागते लोग
मेरे हाथों पैरो में गड़ी कीलें हैं।
लेकिन सिर्फ सुराख़ हो गए हैं
बेजान हथेलियों और तलवों में।
लहू की एक बूंद भी
कभी नहीं गिरी कभी।
सुराख़ –
जिन्हें देखकर लोग डर जाते हैं
लेकिन बदलते नहीं
न अपने प्रति – न मेरे प्रति।
और जो कीलें हैं
उन्हें सिर्फ मेरे ही
जिस्म की धरती सुहाती है –
नर्म, आसानी से रास्ता देती हुई
डरपोक धरती!
जिसमें वे गड़ सकती हैं
बगैर अपने सिरों पर चोट खाए
सिर्फ नाजुक हथेलियों के
दबाव से ही।
लेकिन मैं दुःख रहा हूं
हर कील कांटे को रास्ता देता हुआ
दुःख रहा हूं

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