अप्रयास
आकाशोन्मुख होकर खड़ा हूं
पहले कितनी बार
आज के सूर्य से सूर्य देखा – याद नहीं।
शिखर पर यह तरल ज्वाल वृत्त
मेरी छाया से मुझे मुक्त करता हुआ वृत्त
मुझे हठात ही आकांक्षा मुक्त कर देता है।
या फिर उकेरता है
मेरे भीतर की प्रकाश हीनता को।
कंदराद्वार पर कोई शिला नहीं
पर मेरी धमनियों में उद्घोष नहीं होता
अग्रसर होने का।
मेरा एकांत – सूर्य तप्त एकांत
मेरी वहीं ऐश्वर्य बोध जनित वासना
शिथिल कर देती है मुझे
और वहीं दो शिलायों से निर्मित
छाया कक्ष में बैठ जाता हूं पीठ टिका कर।