अर्थहीन

अर्थहीन

जीने का अर्थ क्या कुछ भी हो सकता है।
सिवाय इसके कि जन्म से मरण तक
समय की अग्नि धुरी पर घूमते रहना है।
शरीर को यह अंतराल जैसे कैसे भी हो सहना है
सिवाय इसके कि आकाश की तरह रिक्त होकर
चतुर्दिक, दिशाहीन, हवाओं सा
अपने ही विस्तार में बहना है।
इसी तरह अर्थहीन उन्मुक्त होकर जिया है
किसी बावड़ी के किनारे पत्थर की तरह बैठकर
निर्भय और आश्वस्त कछुओं को
अपने गीले चिकने वक्ष पर आश्रय दिया है।
पुरानी, खोखली मिट्टी से निकलकर
रेंगते हुए कीड़े
मेरे स्वजन रहे हैं।
मेरी पीठ पर सरसरा कर
संबंधों की लकीरे छोड़ गए हैं
टुकड़ा-टुकड़ा दर्द
मेरे पथरीले रेशों पर झूला गए हैं
लेकिन पतझर के आते ही
पीले और पोपले सुख-दुख
पत्तों की तरह झड़ते हैं मेरे ऊपर।

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