प्रतीक्षा
एक मांसल व्यवस्था है
जिसके कांटे चुभ रहे हैं रोम रोम में
जो मुझे हर क्षण एहसास दिलाते हैं
रक्त हीन होने का
कंकाल होने का
निर्वीर्य होने का।
लेकिन व्यवस्था फिर भी मांसल है
रक्तचाप बढ़ाती हुई
सिर को चढ़ती हुई
आंखों पर नाज़ुक हथेलियां रखती हुई
जो कुछ बीत गया है
उसे तलवों पर चिपकी
मिट्टी की तरह खरोंचती हुई
वर्तमान को
फूलों भरी जादुई टहनी से प्ररेती हुई
और भविष्य को
साफ-सुथरे आकाश पर
तारों की तरह बिखराती हुई
जिसे न कोई छू सकता है
जहां न कोई पहुंच सकता है
सिर्फ उधर आंखें गड़ा कर
रात भर जाग सकता है।