सात्विक हिंसा

सात्विक हिंसा

जिस्म कब अचेत हो गया
मैं कहां जानता
अर्धरात्रि के किसी एक पल
क्रोंच, क्रोंच, क्रोंच
इतनी भयानक चीखें
हिंस्र होकर मंडरा रही थी।
यह पर्वत स्थली,
वनस्थली शांत!
जैसे इस रक्तपात के वैभव को
अपनी अखंडता में भोग रही हो।
मैं चौक पर भय से
काली शिला पर उठ बैठा
कुछ ही ऊपर दो जोड़ी विशाल पंख
एक दूसरे पर झपटते, चक्कर काटते
मृत्यु का सामना करते
जीवन के मोह में,
एक दूसरे को समाप्त करने की
वासना से उत्पन्न भीषण चीत्कार
आक्रमण – प्रति आक्रमण!

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