नदी घर

विमोह

अपने ही अहम् के छिद्र से
झांक कर देखता हूँ
उन बौनों के लिए हैं
जो तृप्त हैं
अपने सर पर – कटोरा भर आकाश से।
यह कुर्सियां, मेज़, बिस्तर और
इन पर बैठते, सोते, जागते लोग
मेरे हाथों पैरो में गड़ी कीलें हैं।
लेकिन सिर्फ सुराख़ हो गए हैं
बेजान हथेलियों और तलवों में।
लहू की एक बूंद भी
कभी नहीं गिरी कभी।
सुराख़ –
जिन्हें देखकर लोग डर जाते हैं
लेकिन बदलते नहीं
न अपने प्रति – न मेरे प्रति।
और जो कीलें हैं
उन्हें सिर्फ मेरे ही
जिस्म की धरती सुहाती है –
नर्म, आसानी से रास्ता देती हुई
डरपोक धरती!
जिसमें वे गड़ सकती हैं
बगैर अपने सिरों पर चोट खाए
सिर्फ नाजुक हथेलियों के
दबाव से ही।
लेकिन मैं दुःख रहा हूं
हर कील कांटे को रास्ता देता हुआ
दुःख रहा हूं

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अर्थहीन

जीने का अर्थ क्या कुछ भी हो सकता है।
सिवाय इसके कि जन्म से मरण तक
समय की अग्नि धुरी पर घूमते रहना है।
शरीर को यह अंतराल जैसे कैसे भी हो सहना है
सिवाय इसके कि आकाश की तरह रिक्त होकर
चतुर्दिक, दिशाहीन, हवाओं सा
अपने ही विस्तार में बहना है।
इसी तरह अर्थहीन उन्मुक्त होकर जिया है
किसी बावड़ी के किनारे पत्थर की तरह बैठकर
निर्भय और आश्वस्त कछुओं को
अपने गीले चिकने वक्ष पर आश्रय दिया है।
पुरानी, खोखली मिट्टी से निकलकर
रेंगते हुए कीड़े
मेरे स्वजन रहे हैं।
मेरी पीठ पर सरसरा कर
संबंधों की लकीरे छोड़ गए हैं
टुकड़ा-टुकड़ा दर्द
मेरे पथरीले रेशों पर झूला गए हैं
लेकिन पतझर के आते ही
पीले और पोपले सुख-दुख
पत्तों की तरह झड़ते हैं मेरे ऊपर।

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प्रतीक्षा

एक मांसल व्यवस्था है
जिसके कांटे चुभ रहे हैं रोम रोम में
जो मुझे हर क्षण एहसास दिलाते हैं
रक्त हीन होने का
कंकाल होने का
निर्वीर्य होने का। 
लेकिन व्यवस्था फिर भी मांसल है
रक्तचाप बढ़ाती हुई
सिर को चढ़ती हुई
आंखों पर नाज़ुक हथेलियां रखती हुई
जो कुछ बीत गया है
उसे तलवों पर चिपकी
मिट्टी की तरह खरोंचती हुई
वर्तमान को
फूलों भरी जादुई टहनी से प्ररेती हुई
और भविष्य को
साफ-सुथरे आकाश पर
तारों की तरह बिखराती हुई
जिसे न कोई छू सकता है
जहां न कोई पहुंच सकता है
सिर्फ उधर आंखें गड़ा कर
रात भर जाग सकता है।

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