ग़ज़ल
हम सर के बर चलेंगे शोलों की सरजमीं पर
हम वो नहीं जो बदले रुख आग की नदी का
गांधी ने देखा-
डूबते सूरज की दिशा में भागते लोगों को ।
हंसे ,अपनी उसी हल्के विनोद की मुद्रा में
जिसे पिछली सदी के लोग और आकाशवासी खूब जानते हैं।
कुछ सोचकर बोले ,एक जुलूस निकालना होगा
डूबते सूरज के पक्ष में।
हमारे हाथों पैरों पर
ज़ेवर की तरह खूबसूरत लगे हमें
जंजीरों के यह निशान
और नई सुबह की नीम खुमारी में
एकदम उन्हें छीलकर उतार फेंकने के
ओछेपन से खुद को बचा लिया हमने
..
इस रात मेरे पहलू में शरर...
वो रात है अब तक याद मुझे जिस रात वो कुछ भी कह ना सकी
वो अपनी वफ़ा से हार गई या मेरी मोहब्बत सह न सकी..
...इस तरह की रात में
ग़म की क़।यनात में
ये ख़याल का फकीर
जिस तरफ़ भी जाएगा
धूल फांक आएगा...