असंदिग्ध

असंदिग्ध

एक लंबी निद्रा के बाद
दिनों -दिन की सारी थकान
अपने संबंध संस्कार
अपनी त्वचा से छिटक कर
अर्ध रात्रि सब कुछ झटक कर
खुले आसमान के नीचे आ खड़ा होता हूं।
सबसे चमकदार सितारे की तरफ़
आंख उठाकर,
सोचने की अवस्था से बहुत परे -
एक आकाशी वस्तु की तरह
सितारों के बीच एक सितारा
बनकर जम जाता हूं।
अपनी खुली छत के फर्श पर
मेरी आंखें ऊपर भी हैं
आकाश पर - फैला हुआ
मायावी संसार देखती हुई
और भीतर भी हैं
अपने ही स्वरूप पर जमी हुई।

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