कहाँ से उदय हुआ यह आभास
उस क्रांति क्षण की प्रतीक्षा
किस भोर से फूटी अचानक
किसी भोर से नहीं-
अपने ही अहम् के छिद्र से झांक कर देखा
अपनी स्थिति की त्वचा छू कर देखा
अपनी आत्म विभोर यात्रा का
एक एक पड़ाव याद आया तो जाना
व्यक्तियों का समूह रहा हूं
मैं अकेला भीड़ से घिरा हर पल
सिर्फ अपने दुख सुनाता उस भीड़ को।
अपने प्रति भावुक , सब के प्रति उदासीन
सारा संसार एक तरफ़-तुच्छ !
मैं अकेला एक तरफ़- प्रबुद्ध, गरिमावान!
पेट में कीड़ों की तरह इच्छाएं पालता
भोर तक बिस्तर में कुलबुलाता,
सपनों की दलदल में धंसता- मैं !
अपने चारों तरफ़ सिर्फ सांस भर लेते हुए
बंधुओं को संहारता-
एकांत अंधकार का ऐश्वर्य भोगता हुआ- मैं !
कितना बड़ा हो गया हूं !!
सोचता हूं अब इन छोटे- छोटे मकानों में
नहीं समा पाऊंगा
यह दरवाजे -खिड़कियां उन बौनों के लिए हैं
जो तृप्त हैं अपने सर पर –
कटोरा भर आकाश से।
यह कुर्सियां, मेज़, बिस्तर और
इन पर बैठते, सोते, जागते लोग
मेरे हाथों पैरो में गड़ी कीलें हैं।
लेकिन सिर्फ सुराख़ हो गए हैं
बेजान हथेलियों और तलवों में।
लहू की एक बूंद भी कभी नहीं गिरी कभी।
सुराख़ – जिन्हें देखकर लोग डर जाते हैं
लेकिन बदलते नहीं
न अपने प्रति – न मेरे प्रति।
और जो कीलें हैं-
उन्हें सिर्फ मेरे ही जिस्म की धरती सुहाती है –
नर्म, आसानी से रास्ता देती हुई डरपोक धरती!
जिसमें वे गड़ सकती हैं
बगैर अपने सिरों पर चोट खाए
सिर्फ नाजुक हथेलियों के दबाव से ही।
लेकिन मैं दुःख रहा हूं
हर कील कांटे को रास्ता देता हुआ दुःख रहा हूं
कितना अखंड, संपूर्ण और वैभवशाली
हो जाता हूं उन सब के लिए
जो मुझे भोग रहे हैं – बचपन से
जिनकी आंखें अंधा जाती है
आकर्षण से मेरे प्रति
जिनको मेरे जिस्म की
नर्म धरती प्यारी है
जो मेरी आत्मा को और
उसकी दूरगामी सिद्धांत हीनता को
घना, काला, आधारहीन अंधेरा मानते हैं
कोई मांसलता नहीं जिसमें वे
उतर सकें सुरक्षित कीलों की तरह।
रेंग सके मीठा चाटते कीड़ों की तरह
लेकिन आज मेरी आत्मा की
उसी दूरगामिता के आकाश से उतर कर
सूर्य की किरणों से बने एक सुनहरे पक्षी की तरह –
एक जगमगाता क्षण मंडरा रहा है
मेरे मस्तक पर।
मेरी आंखें देख रही है एकटक उस तरफ़
यही सुनहरा पक्षी कितनी ही बार
बचपन से अब तक इसी तरह उदय हुआ है
मंडराता रहा है – मेरे मस्तक पर
लेकिन मैं गड़ा रहा हूं
अपने बिस्तर में अपनी मेज़ कुर्सियों पर
पेट में कीड़े पालता हुआ
यही पक्षी रात भर
मेरे ऊपर मंडरा कर सुबह होने से पहले ही
उड़ गया है हमेशा
मेरे जागरण को नकारता हुआ।
मेरी सुबह को
अर्थहीन धुंध में धकेलता हुआ
लेकिन इस बार यही किरण पुंज
संतुलित होकर ठहर गया मेरे ऊपर।
यह जगमगाता क्षण
फैल गया मेरे सारे आकाश पर
मेरी सिद्धांत हीनता की तरह
मुझे आधारहीन करता हुआ।
जिस्म के तर्क से आजाद करता
मेरे लिए – अब ये छते, खिड़कियां, दरवाजे
छोटे पड़ गए हैं या है ही नहीं
हवा का घर केवल
आकाश है – आधारहीन आकाश
उसके सिर पर कोई छत नहीं होती
उसके सिर में कौन कीलें गाड़ सकता है?