प्रकृति के सानिध्य से,
धवल उज्ज्वल विस्तार से
सूर्य के प्रकाश से, हवाओं की गति से
जितनी ऊर्जा, साहस, निश्चय बटोर सकता था
अपने श्वास की गति में
सब कुछ समेटकर
बार-बार इन गुफाओं में प्रवेश करता हूं।
कंदराधिकारी सरकंडों से बने पुतलों की तरह
अपने स्थानों से जैसे बंधे खड़े रहे।
कुछ चरमरा कर
अपने आसपास ही बिखर गए –
कभी किसी का हाथ नहीं उठा।
हवा और सूर्य का प्रकाश
जो मेरे साथ भीतर चला आया था
इन्हें विचलित करने के लिए काफी था,
उठ खड़ा होने के लिए काफी था –
कुछ लड़खड़ाते पांवों के लिए।
मेरे आगे पीछे चलते हुए –
प्रकाश के स्पर्श से
मिचमिचाती आंखों के साथ
गुफाओं से बाहर
आ जाने के लिए काफी था।
कितनी बार प्रवेश हुआ याद नहीं।
अब मैं खुली हवा में मुक्त प्रकाश में
किसी चट्टान से पीठ टिका कर
बैठा हुआ अकेला, अपूर्ण, अशक्त व्यक्ति नहीं था।
मेरे साथ थी नन्ही सी भीड़
अनिश्चित दिशाओं में देखती हुई –
स्वयं को साधती हुई
सब कुछ देखा अनदेखा करती हुई,
एक संयुक्त आह्वान सुनती हुई।
शिला-द्वारों से बाहर आने का आभास
इनके भीतर ही कहीं ऊंघ रहा था।
प्रकाश में उजागर
इनके और मेरे अंतस की धाराओं का संगम
इतनी दूर नहीं था कि मन बैठ जाए।
किसी आधे रास्ते के पत्थर पर –
एक ही करवट देर तक
बैठे रहने से इनके भीतर बाहर
रूप-कुरूप सलवटें पड़ गई है।
लेकिन टूटा-फूटा, उधड़ा-बिखरा
ऐसा कुछ नहीं
कि नदी किनारे बैठ कर
प्रातः और सांझ की लालिमा में नहाकर,
पुरवा-पछुआ हवाओं से बदन पोंछ कर,
अपने स्वरूप को पानी के दर्पण में
निहारा ना जा सके।
जगाया न जा सके किसी संवेदना को।
उकेरा ना जा सके
समर्पित हो जाने के लिए उसी घास फूस को –
जिसे रोंदते हुए निकल गए हैं
वे सभी जो गुफाओं की शरण में ढेर हो गए।
इस नन्ही सी अस्त-व्यस्त
अधचेतन भीड़ को
अपने चेतन मन से जी भर कर देखता हूं।
आंखें और मन भीग जाते हैं
आस की तपन से
कंठ खुल जाता है आह्वान के लिए।
अपनी ही आवाज
हवाओं की सायं-सायं जैसी लगती है।
थोड़ी ही देर में,
यह नन्हा सा व्यक्तियों का द्वीप
सिहर उठता है –
अपने भीतर प्रवेश करती संवेदना सिक्त
उमड़ घुमड़ से।
अलग-अलग दिशाओं में देखते हुए सब
सुन रहे हैं एक संबोधन
जो शायद मेरे ही भीतर से फूट रहा है –
पर्वतों से उतरती हुई पानी की धार जैसा।
अपने को स्थगित करते हुए फूटता है
एक आह्वान-निर्भय हो जाने का।
अपने कानों पर हाथ रखकर
अपना ही गीत सुनने का
आंखें बंद कर अपने रूप पर रीझ जाने का
अपने-अपने भीतर बहती नदी को
समर्पित हो जाने का।