नदी घरनदीघर

नदीघर

नदीघर

आज भी कोई महाभारत
या तीसरा विश्व युद्ध नहीं होगा
मध्य युगीन अश्वारोहियों की दुर्दांत वासनाएं
कोई आतंक पताका फहराते हुई
तुम्हारे शारीरिक या आत्मिक दमन की
दुंदुभि बजाती हुई
तुम्हें घुटने टेक कर
जीवन की भीख मांगने के लिए
विवश नहीं करेंगी।
और न ही प्रताड़ित करेंगी
तुम्हें नन्हा सा साहस बटोर कर
अपनी-अपनी कंदराओं से
बाहर आ जाने के लिए।
तुम्हें – तुम सब को
केवल इतना मात्र करना है
कि खड़े हो जाना है
इस विशाल भवन की तरफ पीठ फेर कर
इस नदी के
गुलाबी जल की तरफ़ मुंह करके
अस्तोन्मुख सूर्य को आत्मसात करना है।
और तुम मेरे मित्र- तुम जो दूर खड़े हो
जानता हूँ तुम्हें बचपन से
आकाश जैसे उजले और
हल्के नीले वस्त्र पहनकर
पक्षियों की और देख रहे हो, 
उनके सांध्य नीड़ गामी
समूह गान को सुनते हुए
चुप खड़े हो –
वापिस जाओ अपने बचपन की ओर
आज से तब तक का अंतराल कुछ भी नहीं
एक ही छलांग में पहुंच जाओगे,

उसी गंदले जोहड़ के किनारे
उसी विशाल वट वृक्ष  के नीचे
अपने अधनंगे साथियों के बीच।
याद है तुम्हें?
एक स्वांग मंडली गांव में आई थी
और उस मंडली के चले जाने के बाद
तुम अकेले ही वह मंडली हो गए थे।
गूंजते फिरते थे सारे गांव में।
नई नवेलियां तुम्हें रोक-रोक कर
तुम्हारा गीत सुनती थी –
तुम्हारी कला और तुम्हारा बचपन
कितना जादू बरसाता था सब पर।
कितने बड़े हो गए हो तुम अब
एक घर चलाते हुए –
एक घर जो तुमसे कभी चला नहीं।
जिस के अतिरिक्त तुम्हें किसी ने
कभी कुछ होने नहीं दिया।
आज तुम्हें स्वयं को देखने का
फिर एक अवसर है।
आज तुम अपनी कंदरा से बाहर आकर
आकाश की ओर देख रहे हो
पक्षियों का गीत सुनते हुए।
हे लघु महा मानव, आज तुम इस छोटी सी
महा मानवों की भीड़ का
एक नन्हा सा भाग हो
एक द्वीप हो – अनतिक्रमणीय द्वीप।
अपनी संपूर्णता में
इस विश्व के महा समुद्र में
अनाक्रांत तैरता हुआ द्वीप।
अपना स्वर संधानो और गूंजने दो फिर से –
सिर्फ तुम्हारे नन्हे से गांव को ही नहीं,

बल्कि इस समस्त वायुमंडल को गूंजने दो।
अपने संपूर्ण अस्तित्व का गीत
सुनने दो सब को।
खंड-खंड होकर जीने की विवशता
आज पीछे छूट गयी है।
इस द्वारपाल रक्षित भवन के पीछे
नीचे की तरफ़ उतरती
खाई में बनी हुई कंदराओं के पीछे
सब कुछ पीछे छूट गया है –
तुम हो और तुम्हारे समक्ष है
रक्तिम सूर्य
तथा उसका दर्पण –
ये तीव्र गामी नदी
जिसका कोई नाम नहीं
यह नदी तुम्हारी नदी है।
तुम्हारी पूर्णता के साथ बहती हुई
तुम्हारी नदी।
जीवन के उद्गम से अंत तक
निरंतर बहती हुई नदी
आकाश और पाताल को एक करती हुई नदी,
अपने किनारे स्वयं बनाती हुई नदी-
जन हिताय सेतुओं के नीचे बहती नदी।
ये तुम्हारी नदी है
सूर्य तो सब का साझा सूर्य है –
लेकिन यह नदी तुम्हारी नदी है।
आज तुम सब थोड़ी सी संख्या में
तुम सब यहां एकत्रित हुए हो
तुम सब की अपनी-अपनी नदी है।
जो कहीं से आकर, तुम में से होती हुई
कहीं भी जा रही है
तुम्हारे पूर्ण अस्तित्व के साथ।

आज तुम सब अपनी नदी पर
सवार होकर निकल जाओ
अपनी-अपनी दिशाओं में
सब कुछ तुम्हारे साथ होगा
तुम्हारा घर बार, सार संसार
लेकिन ऐसा घर बार
जिस की दीवारें
हवा पानी का विरोध नहीं करेंगी।
जिसके आंगन से होकर, तुम्हारी नदी बहेगी,
जहां किसी न्याय अन्याय को
परखने के लिए
तुम्हें अपने अतिरिक्त कोई साक्षी नहीं चाहिए,
विश्व संघ नहीं चाहिए।
जहां जीने के लिए
हर वक्त एक मोर्चा-बंदी न करनी पड़े
और जहां किसी भी छोटे-मोटे
युद्ध में भाग लेने के लिए
तुम्हें घर के रोशन दानों से झांक कर
देखना न पड़े कि बाहर खतरा कितना है
अगर मरण प्रिय हो
तो तुम्हारी नदी तुम्हारे साथ है ही।
अगर मन करे तो कभी भी, कहीं भी 
अधनंगे और  भूखे
बच्चों को लेकर चल पड़ो
दूर किसी देश के अधनंगे और
भूखे बच्चों के साथ
इकट्ठा खेलने या मरने के लिए
और धरती की दरारों में
झांक कर देखने के लिए
कि आज तक की प्रगति
जिसके बारे में वे और उनके मां-बाप –

सुनते हैं बहुत कुछ
कहीं दूर नीचे
बहुत नीचे पाताल में तो नहीं।
और अगर कुछ ना दिखे
तो तुम्हारी आवाज में आवाज मिलाकर कह सकें
कि कहीं कुछ नहीं है,
पाखंड है उन सत्ताधारियों का
जिन्हें उन्होंने कभी देखा नहीं
लेकिन जिनके झूठ से
सारा आकाश गूंज रहा है।
सारी धरती के लोग
जिनकी विराटता की ध्वजा
थामे-थामे कुबड़ा गए हैं।
तुम सब पूर्ण स्वतंत्र हो
कहीं भी सारे विश्व में – निरंतर चल रहे
बाहर से थोपे हुए गृह युद्धों में
भाग लेने के लिए।
जहां के लोग अपने देशों का इतिहास
लिखवा रहे हैं उन लोगों से
जो उस धरती का
रंग, गंध, स्वाद कुछ भी नहीं जानते।
मध्यस्थ तुम भी नहीं बनोगे वहां जाकर
सिर्फ हर बंदूक धारी से इतना भर कहोगे
कि चलो उस चट्टान के पीछे 
सूखी सी झाड़ी पर खिले
जंगली फूल को तोड़ कर उसे दो
जो तुम्हारी प्रतीक्षा में तो नहीं
लेकिन जिसके लिए
तुम्हें देख पाने से बढ़कर
और कुछ भी नहीं।
और उस अर्ध जीवित अस्थि पिंजर को

जो विधिवत तुम्हारा बेटा तो नहीं है –
लेकिन तुम्हारी ही रक्त गंध है उसमें 
उसे गोद में उठा कर कहोगे
कि किसी को कभी भी
उसके कंधे पर बंदूक नहीं रखने दोगे।
उसके रस्सी जैसे बालों में हाथ फिरा कर
उसे खूब प्यार करोगे।
और फिर अगर आंखें भर आए
तो छिपाओगे नहीं
उसे देखने दोगे कि उसके लिए
भोजन से अधिक जीवनदायी
तुम्हारी गीली आंखें हैं।
तुम्हारी यात्रा के अनेक पड़ाव होंगे-
थोड़ा सुस्ता कर फिर चल पड़ने के लिए।
निश्चित केवल मन है, मंज़िल नहीं
केवल एक बहाव है अपनी ही दिशा में –
अपनी ही नदी पर सवार
अनंत ही अंत है।

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