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Song of Hiawatha – Krishan Kishore

हिआवाथा को चिंता थी कि किस प्रकार कबीलों को अपने शरीर से युद्ध के प्रतीक रंगों को धो देने की प्रेरणा मिले। उनमें अपने हथियारों को धरती में दबाकर शांति का गीत गाने की उत्सुकता जगे।हिआवाथा और मिनीहाहा की प्रण्यात्मक संधि के बाद इस तरह की स्वर्णिम स्थिति का उदय हुआ। यह महा काव्यात्मक रचना अत्यंत लोकप्रिय हुई। 1855 में यह कृति प्रकाशित हुई थी।

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Toni Morrison- Krishan Kishore

...पिकोला की दो सहेलियां क्लाडिया और फ्रीडा अपनी नितांत अबोधता और दयनीयता में उम्मीद करती हैं कि वह गेंदे के फूल लगाएंगी।  यदि फूल उग आएंगे, तो  पिकोला का बच्चा ठीक ठाक जन्म लेगा। बाकी लोग इन अबोधों पर हंसते हैं। न फूल खिलते हैं, न पिकोला का बच्चा जमता है...

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साकार झूठ–कृष्ण किशोर

मुझको उल्लू और कोयल की आवाज़ों में कोई फर्क नहीं लगता है
मेरे कानों को सूंघ गया है सांप।
मुझको चूहा और हंस एक से सुंदर
 या भद्दे लगते हैं
मेरी आंखों को लकुआ मार गया है।
मुझे किसी के होठों का रस

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प्रेत जून

भांप लेती थीं उसकी आंखें
आंधी से पहले की स्तब्धता
पत्तों का टूट कर गिरना
पेड़ों में हवाओं की बेचैनी
देख लेती वह उसका 
स्मृतियों से काठ होता शरीर
पहुंच जाती वह भी उसके गांव
और शांत मन से प्रतीक्षा करती

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Joan of Arc: Krishan Kishore

आखिर जोन को चौराहे पर आग के हवाले कर दिया गया। चर्च को लगभग छः सौ साल लगे अपनी गलती स्वीकार करने में जब 1920 में उन्होंने जोन को 'सेन्ट जोन' की उपाधि से विभूषित किया। जोन व्यक्तिगत आज़ादी का ज्वलन्त प्रतीक है। जोन का ज्ञान उस की आवाजें थीं जो चर्च के लिए खतरा बन गई। जोन ऑफ़ आर्क आज भी चौराहे पर खड़ी है। चिताएं आज भी उसके लिए तैयार हैं

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Periodical :June 22 – Overcoat By Gogol- Krishan Kishore

...आधुनिक कहानी के इतिहास का लगभग आरम्भ ही एक ऐसी रचना से हुआ जो आज तक हमारी कला का मापदण्ड बनी हुई है। निकोलाई गोगोल की कृति - 'ओवरकोट'। दोस्तयोवस्की ने कहा था कि हम सब गोगोल के ओवरकोट से निकल कर आए हैं।..

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Periodical, May 22:Marquez Gabriel Garcia- Krishan Kishore

...गैब्रियल गर्सिया मार्केस का उपन्यास Hundred Years of Solitude एक लम्बी कथा कहता है। कई पीढ़ियों का समय एक साथ कथा में मौजूद है। सांसारिक अर्थों में यहां बहुत कुछ वास्तविक नहीं है। वास्तविक और यथार्थ उन के अतीत, परिणाम और निरन्तरता में फैला हुआ है। उसे ही अपने जादू से मार्केस त्रौकालिक बनाते हैं। मौत भी यहां इतनी दुर्दान्त नहीं जिसे हंसते खेलते बताया न जा सके। जीने की गम्भीरता हास्यास्पद हो उठती है जब उसे समय के कोष्ठों में सीमित कर दिया जाए।...

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..कब मुझे ऐसा लगेगा मैं सुरक्षित हूं
कि अब कोई नहीं आवाज देगा मुझे कहीं से भी
और मैं दूर तक आकाश  जैसा फैल जाऊंगा रिक्त हो कर
, बिखर जाऊंगा अपने ही चारों तरफ
या कहीं भी..

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धर्म और नैतिकता – कृष्ण किशोर

..नैतिकता का कोई स्थिर निश्चित स्वरूप न होने की स्थिति में समर्थ लोग हमेशा अनैतिक को नैतिक और नैतिक को अनैतिक सिद्घ कर सकते हैं। आज नैतिकता वैसे भी असंगत और अर्थहीन हो चुकी है। आज कानून निर्धारित करता है कि हम क्या कर सकते हैं, क्या नहीं। चोरी सभी के लिए जुर्म है चाहे किसी की मदद के लिए की गई हो। इसी तरह सभी आचरणों के लिए कानून हैं। सज़ा दी जा सकती है या नहीं, ठीक या गलत, कानून निश्चित करता है। धर्म और नैतिकता की उपयोगिता इन क्षेत्रों में बिल्कुल अर्थहीन हो गई है..

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