जीने का अर्थ क्या कुछ भी हो सकता है।
सिवाय इसके कि जन्म से मरण तक
समय की अग्नि धुरी पर घूमते रहना है।
शरीर को यह अंतराल जैसे कैसे भी हो सहना है
सिवाय इसके कि आकाश की तरह रिक्त होकर
चतुर्दिक, दिशाहीन, हवाओं सा
अपने ही विस्तार में बहना है।
इसी तरह अर्थहीन उन्मुक्त होकर जिया है
किसी बावड़ी के किनारे पत्थर की तरह बैठकर
निर्भय और आश्वस्त कछुओं को
अपने गीले चिकने वक्ष पर आश्रय दिया है।
पुरानी, खोखली मिट्टी से निकलकर
रेंगते हुए कीड़े
मेरे स्वजन रहे हैं।
मेरी पीठ पर सरसरा कर
संबंधों की लकीरे छोड़ गए हैं
टुकड़ा-टुकड़ा दर्द
मेरे पथरीले रेशों पर झूला गए हैं
लेकिन पतझर के आते ही
पीले और पोपले सुख-दुख
पत्तों की तरह झड़ते हैं मेरे ऊपर।
पीठ पर सरसराती हुई सारी लकीरें मिट जाती रही हैं
उनके भुरभुरी चरमराते स्पर्श से।
टुकड़ा-टुकड़ा दर्द –
मेरे रेशों में काई की तरह जमा हुआ दर्द
धुल-पुंछ गया है
जब भी उस बावड़ी क कच्चा किनारा
कहीं से टूट गिरा छपाक सा ठहरे पानी में।
सिहर कर पत्थर का बदन छोड़ गई काई
छिटक कर दूर गिरा
रेशों पर झूलता हुआ टुकड़ा-टुकड़ा दर्द।
साफ सुथरा मैं, फिर से उन्मुक्त!
जन्म से मरण के इस अंतराल को
अग्नि धुरी पर साध कर
एक अर्थ-यात्रा पर निकल पड़ने को आतुर
उठ खड़ा होता हूं।
उस बावड़ी के किनारों से बंधे हुए
पानी की कगारों से,
ध्वस्त दीवारों से मुंह फेर कर
अनिश्चित लेकिन निश्चिंत
कहां जाना है – जाने बिना निकल पड़ना
कितना सुखद लगा।
जीवन की अर्थहीनता का बोध
मैले कुचेले अनुभवों के
पाँवों पर जमी मिट्टी की तरह
धुलपुंछ जाने का सुख
कही दुबक गया था,
लेकिन अब लगभग अचेत सा-
किसी भी अर्थ की तलाश से मुक्त होकर
जहां पहुंचा
वह संज्ञाहीन कर गया मुझे।
एक अबोध स्थिति – दिशाहीन
स्थिर होकर ठहर गई।
लगभग अचेत सा
किसी भी अर्थ की तलाश से मुक्त होकर,
एक लंबी यात्रा पर
निकल पड़ने का आवारा निर्णय
एक सुनिश्चित निर्णय भी नहीं था।
धरती और आकाश का वह छोर –
जहां दोनों एक होते हुए दिखते हैं,
वह दृश्य -प्रवाह की तरह,
मेरे पांवों को गति दे गया।
यात्रा कितनी लंबी रही,
कितनी बार सूरज चढ़ा और डूबा
याद रहने जैसी बात नहीं थी।
जहां पहुंचकर मन ठहर गया,
पांव रुक गए
वह विस्तार संज्ञा हीन कर गया मुझे
मुक्त कर गया, अकर्मण्य कर गया।