एक मांसल व्यवस्था है
जिसके कांटे चुभ रहे हैं रोम रोम में
जो मुझे हर क्षण एहसास दिलाते हैं
रक्त हीन होने का
कंकाल होने का
निर्वीर्य होने का।
लेकिन व्यवस्था फिर भी मांसल है
रक्तचाप बढ़ाती हुई
सिर को चढ़ती हुई
आंखों पर नाज़ुक हथेलियां रखती हुई
जो कुछ बीत गया है
उसे तलवों पर चिपकी
मिट्टी की तरह खरोंचती हुई
वर्तमान को
फूलों भरी जादुई टहनी से प्ररेती हुई
और भविष्य को
साफ-सुथरे आकाश पर
तारों की तरह बिखराती हुई
जिसे न कोई छू सकता है
जहां न कोई पहुंच सकता है
सिर्फ उधर आंखें गड़ा कर
रात भर जाग सकता है।
पूरे दिन की थकान के बाद
तलवों से जांघों तक
दुखती हुई टांगो को
एक पर्वतीय ढलान जैसे
पेट से चिपकाकर
आश्वस्त हो सकता है कि
भविष्य तारों भरा आकाश है।
आज का दुख और कल की थकान
कुछ भी नहीं।
मुझे रात भर जागना है
क्योंकि मेरा भविष्य
सिर्फ अंधेरे में उजागर होता है
साफ़-साफ़ दिखता है
मुझे एक पल भी नहीं सोना है
मांसल व्यवस्था के गदराए हुए जिस्म को
रात भर झेलना है
अपनी धमनियों में बहने देना है।
इसके कांटों की चुभन को
आत्मसात करना है
एक विचार की तरह देखना है
अभी तो केवल इतना है कि
एक व्यवस्था है और एक एहसास
रक्तहीन होने का, निर्वीर्य होने का।
प्रतीक्षा में हूं
वह क्रांति क्षण आएगा
देखना है कि
अपना जिया हुआ हर पल
जो आज पर्वत शिखा पर जमी हुई
बर्फ़ सा सफ़ेद नजर आता है
धवल-उज्ज्वल,
जहां इस गंधाती धरती की हवा में
सांस लेने वाला पक्षी भी पहुंच नहीं सकता –
रक्त में शामिल होकर
जिस्म के होने का साधन
बना कि नहीं?
और सिर से पैर तक हर अंग में
जड़े चमकदार पत्थर
वो शब्द, वो जगमग-जगमग शब्द
जो मुझे जोड़ते हैं इस व्यवस्था से
जिस्म के किस हिस्से से निकले थे?
पैर की अंगुलियों से
आंख की पुतलियों से
या नाभि चीरकर फूटे थे
एक अमृत धार की तरह
मैं प्रतीक्षा में हूं
वह क्रांति क्षण आएगा
सूरज निकलेगा जब
तो यह तारों भरा आकाश किधर जाएगा?