अप्रयासनदी घर

अप्रयास

अप्रयास

आकाशोन्मुख होकर खड़ा हूं
पहले कितनी बार
आज के सूर्य से सूर्य देखा – याद नहीं।
शिखर पर यह तरल ज्वाल वृत्त
मेरी छाया से मुझे मुक्त करता हुआ वृत्त
मुझे हठात ही आकांक्षा मुक्त कर देता है।
या फिर उकेरता है
मेरे भीतर की प्रकाश हीनता को।
कंदराद्वार पर कोई शिला नहीं
पर मेरी धमनियों में उद्घोष नहीं होता
अग्रसर होने का।
मेरा एकांत – सूर्य तप्त एकांत
मेरी वहीं ऐश्वर्य बोध जनित वासना
शिथिल कर देती है मुझे
और वहीं दो शिलायों से निर्मित
छाया कक्ष में बैठ जाता हूं पीठ टिका कर।
आंखें मूंद जाती है बाहर के सत्य पर

किंतु भीतर का सत्य जागता नहीं –
केवल ऊंघता है अर्ध स्वप्न की स्थिति में।
फिर वही प्रश्न – एकाकी “मैं” ही सत्य है?
युद्ध-अयुद्ध केवल स्थितियां हैं
अपने विलय तक पहुंचने की
लेकिन तभी आंखों पर किरणों की तपन
और प्रकाशाभास मद्धिम पड़ जाता है।
हवा का एक ठंडा झोंका
मेरे शिला कक्ष में मुझे छू जाता है
आंखें खोलकर अपनी बाईं ओर देखता हूं
मेरी छाया मेरे साथ है
और फिर वही वासना
जागृत होती है धमनियों में
मुक्त करती है मुझे
अपने विलय के आभास से।
एक चेतना किसी स्मृति को उकेरती है
हवाओं की स्मृति को
टूट कर गिरते पत्तों की स्मृति को
किरण पुंज के नीचे
औंधे लेट कर गाए हुए गीत को
एक पक्षी युगल के
निर्भय मिलन की स्मृति को
नदी तट की एक विशाल भीड़ की स्मृति को
जो अपने दिनों दिन की
संघर्ष यात्रा से त्राण के लिए
एक अदैहिक मुक्ति की खोज में
इधर-उधर भटकती फिर रही है।
याद नहीं आता कोई भी तो युद्ध
महाभारत के कृष्ण से लेकर 
मध्य पूर्व के ईसा तक
और सिकंदर से लेकर हिटलर तक 

जो लड़ा गया हो
दैनिक, व्यक्तिगत, अतिक्रमणों के विरुद्ध
एक व्यक्ति – एक मानव – एक जीवन 
केंद्र रहा हो – किसी युद्ध का
याद नहीं 
व्यक्ति कभी किसी भीड़ से बड़ा हुआ हो 
भीड़ कभी व्यक्ति के लिए लड़ी हो-
याद नहीं।

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