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माँ, मुझे चाहिए वही खिलौना

...लेकिन मां, मुझे चाहिए वही खिलौना
मुझे ले दिया था जो तूने
देवी के मेले में सारी शाम घूम कर
बस मैं था , मेला था और तू थी
उससे मैंने अपनी सारी बातें की हैं
मेरी दादी माँ और नानी माँ अब उसकी भी है

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दोस्त, घास, पेड़ और लोग

..उसके दो पल वहाँ रहने के महिम क्षण ने
घास को घास, पेड़ को पेड़, लोगों को लोग नहीं रहने दिया
लेकिन मैं वहीं जमा रहा
घास पेड़ों और लोगों में अपना चेहरा ढूंढता
..

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जुलूस

गांधी ने देखा-
 डूबते सूरज की दिशा में भागते लोगों को ।
हंसे ,अपनी उसी हल्के विनोद की मुद्रा में
जिसे पिछली सदी के लोग और आकाशवासी खूब जानते हैं।
 कुछ सोचकर बोले ,एक जुलूस निकालना होगा 
डूबते सूरज के पक्ष में।

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Periodical : 2

Do we have a choice?- Krishan Kishore


Today everything is just ordinary. Even in exceptional situations, we expect to see just the ordinary. Our eyes don't open wider or narrower in reflexes. Our brows stay flat and smooth, not furrowed in anger or amazement. This flattened state of mind has generated a weird indifference towards happenings around. This insensitivity is both suicidal and brutal. Until the recent past our society abounded with heroes in all walks of life, families, schools, streets, politics, art, literature, films and in general making a difference that mattered. These not so distant memories remind us that our contemporary reality is very fragmented and fractured..

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आज़ादी की सुबह (और उस के बाद)

हमारे हाथों पैरों पर 
ज़ेवर की तरह खूबसूरत लगे हमें
जंजीरों के यह निशान 
और नई सुबह की नीम खुमारी में
 एकदम उन्हें छीलकर उतार फेंकने के
ओछेपन से खुद को बचा लिया हमने 
..

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यौन-प्रदूषण-बाल-शोषण

यौन प्रदूषण : बाल शोषण-कृष्ण किशोर


जो अभी प्रजनन में भाग लेने के लिए शारीरिक रूप से तैयार नहीं हुआ,ऐसे छोटे बच्चे के साथ यौन क्रिया कर सकने वाला जानवर सिर्फ इन्सान ही है। पशुओं,पक्षियों,कीड़ों-मकौड़ों के यौनाचारों की श्रृंखला में किसी स्तर पर जीवन इतना कामुक और हन्ता नहीं होता कि प्राकृतिक रूप से असमर्थ स्त्री बालक या पुरुष बालक को यौन प्रक्रिया में शामिल करे,बाधित करे,उत्पीड़ित करे,शोषित करे...

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Periodical

Uneven Fields -Krishan Kishore


...Only a sense of equality, even if people are not really equal, keeps a society free and fearless to challenge any one who is suspected of using unacceptable means. This situation exists  in some parts of world, largely in the U.S. and some European countries. People have a sense of equality even if they are not equal.That gives them a sense of power, confidence and dignity. Fearlessness is a natural consequence ...

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आलोचना:

इन्सान के विराट का जयघोष - उपन्यास-कृष्ण किशोर


एक नई सभ्यता की तरह उपन्यास का उदय हुआ। लेकिन कोई भी सभ्यता एकदम किसी घटना की तरह घटित नहीं होती, सदियों की सामूहिक और समुचित स्मृति हमारी चेतना में बहती रहती है। किसी खास प्रक्रिया के तहत वक्त का चेहरा कुछ और लगने लगता है। इन्सानी कल्पना और अनुभव करने की किसी उद्देश्यहीन उत्कट आकांक्षा का सीधा प्रतिफलन उपन्यास बना।..

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प्रवासी मानसिकता, भाषा और सृजन

प्रवासी अहसास की कई परते हैं। कहीं न कहीं अतीत की बची-खुची ऐतिहासिक निजता बनी ही रहती है जो अपने कहीं और होने के एहसास को जीवित रखती है। ठीक अपने घर में न होकर कहीं और होने का एहसास ही प्रवासी एहसास है। अपनी परम्परा और पहचान से जुड़े रहना एक बात है, वहां बैठ कर एक ही ओर देखते रहने का नास्टेलजिया दूसरी बात।

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